Goutam Buddha

गौतम बुध आर्य सत्य (Bagman Goutam Buddha Arya Satya)

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भगवान गौतम बुद्धा द्वारा दिए गए 4 आर्य सत्य निम्न है

  1. दुःख
  2. दुःख – समुदय
  3. दुःख निरोध
  4. दुःख निरोध मार्ग
    यदि हम पहले सत्य की बात करे तो संसार दुख -मय है।यह लोकिक अनुभव से सिद्ध है संसार में जो भी चीज़ है सब नस्वर है इस कारन से यह दुःख रूप है जो लोकिक सुख है वह भी अस्थाई है

दु:ख

समस्त संसार में दुख ही दुख है और यह संसार चारों ओर से दुखों से भरा पड़ा। अर्थात समस्त सृष्टि में सब कुछ दु:खमय है। इस संसार में सब कुछ ना मिलना ही दुख है सुख को प्राप्त करने का प्रयास भी दु:ख है। अगर सुख प्राप्त हो जाता है तो उस सुख को यथावत रखने का प्रयास भी दु:ख है। क्योंकि इस संसार में प्रत्येक वस्तु अनित्य है और नश्वर है और उसका अंत कभी ना कभी तो होगा और उसके अंत होने के बाद दुख तो होगा ही।

जन्म से लेकर मृत्यु तक सारा जीवन दुख में है मृत्यु के बाद भी दुख का अंत नहीं होता है क्योंकि उसके बाद पुनर्जन्म होता है और फिर मैं तूतिया यह एक प्रकार से मृत्यु जन्म मृत्यु जन्म चक्र निरंतर चलता ही रहता है। प्रत्येक जीव इस में फंसकर दुख भोगता है। धम्मपद में भगवान गौतम बुद्ध कहते हैं कि जब समस्त संसार आग से झुलस रहा है तो आपको आनंद मनाने का अवसर कब मिलेगा। महात्मा गौतम बुद्ध कहते हैं कि संसार में दुखियों ने जितना आंसू बहाया है उनका आंसुओं का जल महासागर के जल से भी ज्यादा है।

समुदाय

समुदाय का अर्थ होता है उदय उदय का मतलब है प्रकट होना। अगर कोई वस्तु प्रकट होती है या उदय होती तो उसका कोई ना कोई कारण होता है। अगर दुख है तो दुख के कारण भी हैं मौजूद है। भगवान गौतम बुद्ध कहते हैं अविद्या की समस्त दुखों जरामरण का मूल कारण है।
अविद्या
संस्कार या कर्म
नामरूप
षडायतन अर्थात पांच ज्ञानेंद्रियां और मन व उनके विषय
स्पर्श अर्थात इंद्रियों और उनके विषयों का संपर्क
वेदना अर्थात इंद्रियों का अनुभव
तृष्णा अर्थात किसी वस्तु की इच्छा या लालच
उपादान अर्थात किसी अस्तित्व मोह की कामना
भव अर्थात अस्तित्व
जाति अर्थात पुनर्जन्म
जरा मरण अर्थात दुख ही दुख

निरोध या निर्वाण

महात्मा गौतम बुद्ध ने दुखों से निरोध कोही निर्वाण या मोक्ष कहा है यह व्यवस्था है जिसमें दुखों का मूल कारण अविद्या है यहां पर अभिज्ञ को दूर करके दुखों का अंत किया जा सकता है। दुख अगर दुख मौजूद है तो दुख से निवारण के रास्ते भी मौजूद हैं। यहां पर निर्वाण का अर्थ जिसे मोक्ष भी कहते हैं जीवन का अंत नहीं अपितु दुखों का अंत कहा गया है। मानव का शरीर उसके पुनर्जन्म के कर्मों के फल से तय होता है जब तक कि उसके कर्म फल समाप्त नहीं हो जाते शरीर भी समाप्त नहीं होता अपितु शरीर बार-बार पुनर्जन्म लेता रहता है।

मार्ग

दुख से निवारण के जो रास्ते हैं उन रास्तों पर चलकर आप दुख से निर्मिती पा सकते हैं या आठ प्रकार के जिन्हें अष्टांग मार्ग भी कहा जाता है। भगवान गौतम बुद्ध ने दुख निरोध मार्क जिस पर चलकर कोई भी मानव प्राणी निर्माण को प्राप्त कर सकता है।
यह नैतिक व आध्यात्मिक साधना का मार्क है जिसमें अष्टांग मार्ग हैं। अष्टांग मार्ग का मतलब है मध्यम मार्ग जो अत्यंत भोग विलास और अत्यंत कठोर तपस्या के मध्य का मार्ग है। यह मार्ग इंद्रिय विलास और अनावश्यक कठोर तप के बीच का रास्ता है।

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