Mohan Das Karmchandra Gandhi
जीवन लेख

महात्मा गाँधी के अनुसार अहिंसा की अवधारणा

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“अहिंसा का अर्थ केवल ऋषियों और सन्तों के लिए ही नहीं है, सामान्यलोगों को भी इस धर्म का पालन करना चाहिए ।”

  • महात्मा गाँधी “अहिंसा” शब्द निषेधात्मक ‘अ’ उपसर्ग से आरंभ होता है। जिसका अर्थ हुआ, दूसरे प्राणियों की हानि और हत्या न करना, किन्तु गाँधी जी अहिंसा के शाब्दिक अर्थ से कहीं आगे बढ़ जाते हैं। उनके नीति-चिंतन से अहिंसा अकर्म का सिद्धान्त न होकर एक ऐसी सक्रिय शक्ति बन जाती है, जो सर्वोच्च है। गाँधी जी इसे आत्मबल कहते हैं ।
  • किसी जीव को हानि न पहुंचाना अहिंसा की न्यूनतम अभिव्यक्ति है ।
  • अहिंसा का मूल अर्थ प्रेम और करूणा है ।
  • अहिंसा का सार तत्व अपने व्यापक अर्थ में प्रेम ही है ।
  • अहिंसा में निहित प्रेम संकुचित न होकर अधिकतम उदार है और उसकी तुलना ईसाई धर्म में प्रतिष्ठित सद्गुण, चैरिटी से की जा सकती है ।

यूनानी शब्द ऐगपी भी इसके काफी निकट आते है। गाँधी जी ने इस प्रकार अपनी व्याख्या से अहिंसा के मूलगत निषेधात्मक अर्थ हिंसा न करना, को बहुत पीछे छोड़ दिया है तथा उसे करूणा से संचालित कर्म माना है । अहिंसा में निहित प्रेम और सद्भाव इतना व्यापक है, कि वह अन्यायी व्यक्ति के प्रति भी घृणा का भाव रखने की आज्ञा नहीं देता ।

“महात्मा गांधी के तीन अमोघ अस्त्र थे- सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह।” उनका अनुभव था कि मानवीय सम्बन्धों की सभी समस्याओं का एकमात्र हल अहिंसा ही है। • अहिंसा हिंसा से अधिक शक्तिशाली है।

सच पूछा जाय तो गाँधी की समस्त विचारधारा दो केन्द्रीय भाव-स्त्रोतों” से ही पनपी है । एक भाव है ‘सत्य’ तथा दूसरा है ‘अहिंसा’ । दोनों भाव को वे एक विशेष अर्थ में अभिन्न भी कहते हैं, क्योंकि एक का विचार अनिवार्यतः दूसरे तक ले ही जाता है। उनकी स्वीकारोक्ति है, कि सत्य की तलाश में उन्हें अहिंसा का विचार भी प्राप्त हो गया । सत्य पर किये गये अपने प्रयोगों से वे आप से आप अहिंसा पर आ गये । वे कहते हैं

“I have nothing new to reach the world. Truth and Non-Violence are as old as the hills. All have done is totaly experiments in both on as vast a scale as I could. In doing so I have some times erred and learnt by my errors, life and its problems have become to me so many experiements in the practice of truth and non-violence….. In fact it was in the course of my pursuit of truth that I discovered non violence.

“अहिंसा एक दूसरे के प्रति प्रेम और आदर को जन्म देती है तथा सभी मनुष्यों को समान समझने की प्रेरणा देती है। गाँधी ने सत्य और अहिंसा का प्रयोग सभी परिस्थितियों में किया और घृणा तथा शंकाओं पर विजय पाने में सफल हुए ।”

“गाँधी जी के लिये अहिंसा, सत्य की अनेक अभिव्यक्तियों में से एक अभिव्यक्ति होने के नाते, एक सत्ता मूलक धारणा है।”

“महात्मा गाँधी के अनुसार अहिंसा केवल एक दर्शन नहीं है, बल्कि कार्य करने की एक पद्धति है. हृदय परिवर्तन का साधन है। गाँधी के अनुसार अहिंसा कर्म की प्रेरणा है। यह उदासीनता या निष्क्रियता की मनोवृत्ति नहीं है। यह ठीक है कि अहिंसा की जड़ें अन्तः में रहती हैं, किन्तु वो बाह्य कर्मों को प्रेरित करने के स्त्रोत हैं। अहिंसा को कुछ क्षणों में सम्पादित हो गया कर्म नहीं है, है तो एक सतत् प्रवाह है।”

“भारतीय नैतिक प्रत्ययों में अहिंसा के प्रत्यय पर अधिकतम बल दिया गया है। अहिंसा का अर्थ है कि मनुष्य का मन, वचन व कर्म तीनों शुद्ध होना चाहिए, केवल यही आवश्यक नहीं है, कि किसी को चोट न पहुँचाऐं । यह भी आवश्यक है कि मनुष्य का आचरण द्वेष व शत्रुता से प्रेरित न हो । अहिंसा वही कर सकता है, जिसे ईश्वर व संत में विश्वास है।”

“अहिंसा का उल्लेख भारत के प्राचीनतम ग्रन्थों में मिलता है। उपनिषदों में जैन तीर्थकरों के लेखों में तथा बुद्ध के दर्शन में अहिंसा का विचार किया गया है।” 5 ‘हमारा स्वराज्य ऐसा होना चाहिए, जो न हिंसा से प्राप्त किया जा सकता है और न औद्योगीकरण से- यदि प्रत्येक व्यक्ति सत्य पर डटा रहे तो स्वराज्य अपने आप हमारे पास चला आयेगा ।”

“गाँधी जी ने जिस अहिंसा का प्रतिपादन विका। वह निषेधात्मक धारणा न होकर वस्तुतः एक विधेयात्मक शक्ति है। यह बुराई को अच्छाई से जीतने का सिद्धान्त हे, जिसमें कोई बदले की भावना नहीं है। कोई षडयंत्र नहीं है। कोई प्रतिकार नहीं है, कोई संगठित युद्ध या गुप्त हत्या नहीं है ।”

वास्तव रूप से अधिकांश लोग केवल किसी न किसी को न मारना ही अहिंसा समझते हैं, पर महात्मा गांधी के अनुसार यह अहिंसा का केवल आशिक अर्थ है। अहिंसा में इसके अतिरिक्त और कुछ भी है, कुविचार मात्र हिंसा है, उतावली सिहि, मिथ्या भाषण हिंसा है, किसी का बुरा चाहना हिंसा है, जगत को जिस चीज की आवश्यकता है, उस पर कब्जा रखना भी हिंसा है।

स्पष्ट है कि महात्मा गाँधी की अहिंसा में वैचारिक सावधानी भी नितान्त आवश्यक है । वाणी और संवेगों को भी नियमित करना अनिवार्य है। जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति में संयम रखना अपेक्षित है। संक्षेप में, गाँधी जी अहिंसा की अवधारणा मन, वचन और कर्म से सम्बंधित है।

गाँधी जी के लिए “सत्य” साध्य या लक्ष्य है और अहिंसा उसकी प्राप्ति का साधन है। अहिंसाके बिना सत्य की खोज एवं उसकी प्राप्ति दोनों असंभव है । अहिंसा एवं सत्य में इतना परस्पर सम्बन्ध है, कि दोनों को पृथक करना असंभव है । वे एक सिक्के दो पहलू हैं अथवा उस अचिन्हित धातु के दो पहलू हैं, जिनके सीधे और उल्टे के बीच निर्णय करना कठिन है।

अहिंसा हमारे अस्तित्व का सिद्धान्त है। यदि हमें संसार में जीवित रहना है तो हमें दूसरे से प्रेम अवश्य करना होगा। गाँधी जी एक क्षण के लिए भी सोच नहीं सकते थे, कि संसार घृणा एवं हिंसा पर आधारित हो सकता है। अहिंसा एवं प्रेम जीवों के अस्तित्व का विधान है ।

“यह तथ्य ही कि अभी तक संसार में असंख्य प्राणी जीवित हैं. इस बात का ज्वलन्त प्रमाण है, कि उसकी आधारशिला शास्त्रों की शक्ति नहीं, वरन् सत्य एवं प्रेम की शक्ति है।”

गाँधी जी ने विकासवाद के सिद्धान्त के आधार पर भी अहिंसा का प्रतिपादन किया। उन्होंने कहा कि मूलरूप से हम सभी पहले जंगली थे । धीरे-धीरे विकास के परिणामस्वरूप हम पशु से मनुष्य रूप से आये । मानव इतिहास इस बात का साक्षी है, कि मनुष्य की हिंसक वृत्ति का क्रमशः हास और उसकी अहिंसक वृत्ति का क्रमशः विकास हो रहा है ।

मैं काल्पनिक विचारक नहीं हूँ । में एक व्यवहारिक आदर्शवादी हूँ । अहिंसा का धर्म केवल ऋषियों एवं सन्तों के लिए ही नहीं, वरन् वह सर्वधारण के लिए भी है। जिस प्रकार पशुओं में आत्मा सुषुप्त होती है, अतः वे शक्ति-सिद्धान्त के सिवा कुछ भी नहीं जानते ।

मनुष्य की प्रतिष्ठा के लिए यह आवश्यक है, कि वह किसी उच्च विधान-आत्मा की शक्ति में अपने को समर्पित कर दे। गाँधी का यह अटूट विश्वास था कि स्थायी सामाजिक क्रांति के लिए हिंसा का सहारा नहीं लिया जा सकता, क्योंकि हिंसा, हिंसा को जन्म देती है।

स्थायी क्रांति प्रेम और अहिंसा द्वारा ही संभव है, जिसमें कभी-कभी दूसरों के हृदय परिवर्तन करने के लिए हमें शरीर की आहूति भी देनी पड़ सकती है। गाँधी जी अपने अहिंसा के सिद्धान्त को आत्मा के पुर्नजन्म सिद्धान्त के साथ संयुक्त किया है ।

यदि किसी व्यक्ति की आत्मा इतनी दूषित है, कि वह तत्काल सत्य का अवलोकन नहीं कर सकती, तो ऐसे व्यक्ति को तत्व का साक्षात्कार कराने के लिए यदि • प्राणों का भी बलिदान करना पड़े तो भी हमें करना चाहिए। अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है, कि गाँधी जी का वास्तव में अहिंसा से क्या तात्पर्य था. इस बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा है

“यह अहिंसा वह स्थूल वस्तु है, जो आज हमारी दृष्टि के सामने है। किसी को न मारना इतना तो है ही । कुविचार मात्र हिंसा है। मिथ्या भाषण हिंसा है। द्वेष हिंसा है। किसी का बुरा चाहना हिंसा है। जगत् के लिए जो आवश्यक वस्तु है । उस पर अधिकार बनाये रखना हिंसा है।” – मंगल प्रभात

“हिंसा मिथ्या है, माया है, अहिंसा ही सत्य वस्तु है। अहिंसा के बिना सत्य का साक्षात्कार असंभव है । ब्रम्हचर्य, आस्तेय, अपरिग्रह भी अहिंसा के अर्थ में सम्मिलित है । ये अहिंसा को सिद्ध करने वाले हैं। अहिंसा सत्य का प्राण है, उसके बिना मनुष्य पशु हैं।”-गीता माता

“अहिंसा सभी जीवित प्राणियों के प्रति दूषित भावना का सर्वथा अभाव है ।

“जान बूझकर भी दूसरों की गलतियों के लिए दुःख झेलना अहिंसा का गव्यात्मक रूप है।” अहिंसा केवल इस मूल सिद्धान्त पर आधारित है, कि जो नियम एक व्यक्ति के प्रति लागू होता है, वह पूर्ण विश्व के लिए भी उतना ही लागू होता है।

जब कायरता और हिंसा में से एक पर चलना हो, तो मैं हिंसा पर चलना अच्छा समझता हूँ। में बिना किसी को मारे हुए शान्तिपूर्वक मर जाने का साहस उत्पन्न करना चाहता हूँ, पर जिस किसी में यह साहस नहीं, उसके लिए मैं यही अच्छा समझता हूँ, कि लज्जापूर्वक खतरे से दूर भागने के बजाय वह मारे और मरे ।

जो तलवार चलाते चलाते मारे जाते हैं, वे निश्चित ही बहादुर हैं, किन्तु जो तलवार की चोट बिना उँगली उठाये अथवा स्थिर हुए सहन कर लेते हैं, उनसे भी अधिक बहादुर हैं।

उपर्युक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि एक मुक्त और वीतराग ही पूर्णरूप में अहिंसक हो सकता है। साधारण मानवों के लिए अहिंसक होना सरल कार्य नहीं है। गाँधी जी ने अहिंसा शब्द को बहुत व्यापक रूप में लिया है। निषेधात्मक रूप में यह किसी को मनसा, वाचा, कर्मणा और कामेन चोट न पहुंचाना है।

विधायक रूप में अहिंसा का अर्थ है प्राणिमात्र के प्रति प्रेम और सेवा-भाव । पर यदि अहिंसा का पूर्ण परिपालन केवल मुक्त और वीतराग व्यक्ति ही कर सकते हैं, तो फिर साधारण व्यक्तियों के लिए कौन सा साधन उपलब्ध है।

व्यावहारिक दृष्टि से यदि अहिंसा-हिंसा पर विचार किया जाये तो पूर्ण हिंसा और पूर्ण अहिंसा दोनो अमूर्त-प्रत्यय प्रतीत होंगे । व्यक्ति न तो पूर्ण हिंसा द्वारा और न पूर्ण अहिंसा द्वारा ही संसार में जीवित रह सकता है । उसे हिंसा और अहिंसा के बींच मध्यम मार्ग निकालना ही पड़ेगा। गाँधी जी इस तथ्य को भलीभाँति समझते थे । एक स्थल पर उन्होंने लिखा है, “हिंसा व्यापक वस्तु है।

हम हिंसा की होली के बीच घिरे हुए पामर प्राणी है। यह वाक्य गलत नहीं है. कि जीव, जीवन पर जीता है। मनुष्य एक क्षण के लिए भी बाहय हिंसा के बिना नहीं जी सकता । यदि इस हिंसा से सूक्ष्म से सूक्ष्म जन्तु का भी नाश नहीं चाहता ओर यथाशक्ति उसे बचाने का प्रयत्न करता है, तो वह अहिंसा का पुजारी है।

किन्तु कोई देहधारी बाह्य हिंसा से सर्वथा मुक्त नहीं हो सकता ।” इस उद्धरण से स्पष्ट है कि हिंसा और अहिंसा का निर्णय वाहय प्रयत्नों से नहीं, वरन् उन प्रयत्नों में निहित भावनाओं से निर्धारित होता है।

गांधी ने अहिंसा के पालक के लिए 11 वृत्तों का अनुमोदन किया है, जो आचार्या विनोबा के शब्दों में निम्न है :

“अहिंसा सत्य अस्तेय ब्रम्हचर्य असंग्रह । शरीस्त्रम अस्वाद सर्वत्र मयवर्जन । सर्वधर्मी समानत्व स्वदेशी स्पर्श भावना । ही एकादश सेवावी नमृत्व वृतनिश्चये ।।” – (बिनावकृत श्लोक)

“अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी न करना) ब्रम्हचर्य, असंग्रह (संचय न करना अपरिग्रह), शरीर श्रम, अस्वाद, सर्वत्र भय वर्जन (अभय), सर्वधर्मी समानत्व (सभी धर्मों के बराबर समझना), स्वदेशी (अपने देश की वस्तुओं का ही उपयोग करना), स्पर्श अहिंसा के ही विभिन्न रूप हैं। इस प्रकार गाँधी जी के अनुसार अहिंसा ही सब धर्मों का मूल है।”

“अहिंसा से जीवन की पवित्रता और मानव प्रतिष्ठा का भाव निहित है।”

“प्रेम और करूणा के अतिरिक्त अहिंसा के सिद्धान्त में जीवन की पवित्रता का भाव भी निहित है। हिंसा न करने का आदेश इसलिये सार्थक है कि जीवन पवित्र है। महाभारत में कहा गया है कि जीवन दान सबसे बड़ा दान है और वह मनुष्य जो इसे दे पाता है, सारे विद्वेष और शत्रुता शांत कर देता है।

किन्तु गाँधी जी जीवन की पवित्रता पर बल देते हैं, वहीं वे इस बात से अनमिन्न नहीं है, कि शरीरधारी मनुष्य के लिए थोड़ी बहुत हिंसा आवश्यक है। हम सब अपने शरीर की रक्षा के लिये और अपने आश्रितों की सुरक्षा के लिए थोड़ी बहुत जीव हिंसा करते ही हैं, किन्तु यह बात हिंसा करने के लिये हमें कोई औचत्य प्रदान नहीं करतीं।

वस्तुतः सत्यान्वेषी को अपनी वैयक्तिक आवयकताओं के अनुसार अपने को सदा समायोजित करते रहना पड़ता है । इस समायोजन में उसका सतत् प्रयत्न रहता है, कि वह हिंसा को अपने दायरे को कम कब्जा रहे ।

अपने और अपने आश्रितों की सुरक्षा के लिये यदि हमें हिंसा करना ही तो उसे जितना कम किया जा सके उतना ही अच्छा। हिंसा कम नहीं की जा सकती और उससे मुक्ति असंभव है, यह सोचना सर्वथा गलत है।