Non violence according to Jain

जैन मत के अनुसार अहिंसा भाव

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अहिंसा से तात्पर्य है अन्य जीवों की हिंसा का वर्जन जैन दर्शन के जीव संबंधी विचारों में हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि जैन दर्शनकार गतिशील द्रवों के अतिरिक्त स्थावर द्रव्यों में जीव को मानते हैं अतः जैन मत के अनुसार केवल ज्ञान जीवों के प्रति अहिंसा भाव ही अहिंसा नहीं अपितु स्थावर जीवों की हिंसा करना भी निकृष्ट कर्म है।

इस प्रकार जैन दर्शन में अहिंसा का भाव अति व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है। जैन दर्शन के अनुसार सभी जीव यथार्थ रूप में समान है। अतः सभी जीवों के प्रति समादर का भाव होना चाहिये। प्रत्येक मनुष्यों के प्रति वैसा ही आचरण होना चाहिये जैसे आचरण की वह दूसरों से अपने लिए अपेक्षा रखता है।

जैन दर्शन में केवल जीवों कह हिसा न करना ही अहिंसा का पूर्ण भाव नहीं है अपितु हिंसा के विषय में विचार करना बोलना अथवा दूसरों को हिंसा के लिये प्रोत्साहित करना भी हिंसा का ही अंग है अतः मन वचन और कर्म से अहिंसा वृत का पालन करना ही अहिंसा है।

नैतिक क्षेत्र में अहिंसा के सिद्धांत का महत्पूर्ण योगदान है। महावीर के पहले पार्श्वनाथ के समय व नेमिंगथ के समय भी पलो में पशुओं आदि की बलि दी जाती थी। महावीर ने हमें घृणित समझा और अहिंसा बेगरे की बुलन्द किय। उन्होंने कहा कि सभी जीव, प्राणी जीवित रहना चाहते हैं अतः उत्तम है स्वयं भी जियो ओर अन्यों को भी जीने दो।

इससे वैभजन्य को बचाय सामजस्य स्थापित होगा घृणा की बजाय प्यार ही प्यार होगा। अतः वह दूसरों के लिए न किया जाए तो हम स्वयं अपने लिए करवाना नहीं चाहते। हम मरना नहीं चाहते अतः दूसरों को भी नहीं मारना चाहिए।

महावीर ने तो भौतिक हिंसा ही नहीं बल्कि शब्दिक और मानसिक हिंसा को भी बुरा बतलाया। हिंसा के बारे में बोलने ओर सोचने से भी कर्म बद्ध होता है। और कर्म से छुटकारा व्यक्ति का परम ध्येय होना चाहिये यदि वह मुक्ति चाहता हो तो। महावीर के अहिंसा के सिद्धांत का व्यापक प्रभाव पड़ा। कई शासक व शासित शाकाहारी हो गए।

जैन धर्म में हिंसा के प्रकार साकल्पिक ओर असाकल्पिक

रन्टीवेसन के जैवियों के अहिंसा के सिद्धांत को विचित्र अतियुक्ति और हृदयों कहा है परंतु ऐसा नहीं है जैन धर्म में दो प्रकार की हिंसा बतलायी गई है। 1, साकल्पिक ओर 2. असाकल्पिक।

क्र.सांकल्पिक हिंसाअसाकल्पिक हिंसा
1.सांकल्पिक हिंसा (मन, वचन और कर्म से की गई घोर पाप हैअसाकल्पिक है जिसके ये उपभाग है 1. आरंभी 2. उद्योगी तथा 3. विरोधी चक्की, चूल्हा, ओश्वली, झाडू तथा स्नानघर से संबंध हिंसा आरंभी हिंसा कहलाती है
2.इससे संसार में अशांति तथ अनाचार फैलाता है कार्य को प्रकृतिवहा न जानकर की जाने वाली हिंसा है।जो कि गृहस्थ के लिए पाप नहीं है क्योंकि स्वच्छता रखना मानव का धर्म है अपने उद्योग को चलाने के लिए तथा न्यायसंगत अहिंसक व्यापार को सुरक्षित रखने के लिए जो हिंसा होती है
3.उसे उद्योगी हिंसा माना जाता है। दूसरे व्यक्ति द्वारा आक्रमण किये जाने पर स्वंय की तथा स्वजनों की रक्षा के लिए जो हिंसा होती है।
उसे विरोधी हिंसा माना जाता है। जैसे संस्कृति में सांकल्पिक हिंसा को त्याज्य ओर असांकल्पिक हिंसा को जीवगर्थ उचित बतलाया गया है।

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